top of page

हैलो मैं हूँ जेनरेशन Z

Writer: Duggal Shallu
Duggal Shallu
Sep 15
7 min read

हैलो मैं हूँ  जेनरेशन Z

हम Gen Z हैं। लोग हमें कहते हैं—‘फोन में डूबे हुए बच्चे’, ‘रिश्तों से कटे हुए’, ‘आलसी’, ‘बाग़ी’।पर क्या कभी किसी ने हमें सच में सुना है?क्या कभी किसी ने समझा है कि हम जैसे हैं, वैसे क्यों हैं?हम खोए हुए नहीं हैं, बस अलग हैं। और शायद यही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।"

हर पीढ़ी का अपना नाम, अपना रंग और अपनी पहचान होती है।किसी को "आज़ादी की पीढ़ी" कहा गया, किसी को "त्याग की पीढ़ी", किसी को "सपनों की पीढ़ी"।और अब हम हैं—जेनरेशन Z।

हम वो हैं जिन्होंने जन्म लेते ही मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल स्क्रीन को देखा।हमने दादी-नानी की कहानियों से ज़्यादा YouTube की नर्सरी राइम्स सुनीं।हमने आँगन के खेलों से ज़्यादा PUBG और Free Fire खेले।हमने मोहल्ले की चौपाल से ज़्यादा Instagram की reels देखीं।

तो अगर हम अलग हैं, तो हैरानी क्यों? हमारी परवरिश ही हमें अलग बनाती है।लेकिन क्या "अलग" होना हमेशा "गलत" होना होता है?नहीं। हम बस अपनी भाषा, अपना अंदाज़ और अपने सपने लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

 

 

बचपन और स्क्रीन की शुरुआत

मैं पाँच साल का था जब पहली बार मम्मी ने मुझे मोबाइल पकड़ा दिया।मुझे रोना आ रहा था और मम्मी को ज़रूरी काम करना था ।उन्होंने YouTube पर कार्टून चलाया और कहा—"लो बेटा, ये देखो... बस चुप हो जाओ।"

उस दिन से मोबाइल मेरा दोस्त बन गया।खाना खाते वक्त भी स्क्रीन चाहिए, खेलते वक्त भी स्क्रीन चाहिए, और सोने से पहले भी। धीरे-धीरे यही मेरी आदत, मेरा सहारा और मेरी दुनिया बन गया।अब मम्मी अक्सर नाराज रहती है की मैं उनके पास बेठता नहीं जब उनको मेरे पास बेठना था तब मुझसे जरूरी बहुत से कामम थे उनके पास उनको अपनी सहेलियों से बात करनी थी तो मैँ घंटों टीवी देखू उनको कोई शिकायत नहीं होती थी फिर आज मुझसे इतनी शिकायत क्यू ?

आज हर Gen Z की कहानी कुछ ऐसी ही है।हमने मोबाइल अपने हाथों से नहीं उठाए, हमें दिए गए।कभी सुविधा  के लिए, कभी लालच के लिए और कभी इनाम  के लिएऔर काभी हम आपके दोस्तों के बच्चों से पीछे न रह जाए

याद है पापा ने एक दिन मम्मी को बोल था  “अरे मेरे दोस्त का बेटा तो छोटी उम्र मे ही सारी कविता इंग्लिश मे बोलत है तुम नहीं इसको यूट्यूब पर इंग्लिश कविता देखाया करो” पापा ने यह क्यू नहीं बोला की हमको इसको कविता सिखनी होगी अब शिकायत क्यू की हम अपने सारे सवालों का जावब कंप्युटर फोन से देखते है

 

लोग कहते हैं—"ये Gen Z तो हमेशा फोन में डूबी रहती है।"पर कोई ये क्यों नहीं पूछता कि हमने उसमें डूबना चुना, या हमें उसमें डुबो दिया गया?

 

 असली रिश्तों से दूरी : हमारी गलती या हालात?

रिया भी मेरी तरह Gen Z है।उसके पापा corporate job करते हैं और मम्मी भी office जाती हैं।सुबह दोनों जल्दी निकल जाते हैं और रात देर से लौटते हैं।रिया का ज़्यादातर समय घर में अकेले बीतता।

शुरुआत में वो खिलौनों से खेलती, लेकिन धीरे-धीरे boredom ने उसे मोबाइल की तरफ खींच लिया।Insta, WhatsApp और YouTube उसके साथी बन गए।

रिया कहती है—"कभी-कभी मुझे बहुत अकेलापन लगता है।काश घर में कोई होता जो मुझसे पूछता कि मैं कैसी हूँ।लेकिन जब सब busy होते हैं, तो इंसान अपनी बातें कहाँ सुनाए?इसलिए मैंने Insta और WhatsApp को चुन लिया।"

क्या इसका मतलब ये है कि हम Gen Z को असली रिश्तों की कद्र नहीं?नहीं।हमसे हमेशा कहा गया की दादा दादी नाना नानी मेहमान है जो कुछ दिन के लिए आते है हमको काभी यह बताया ही नहीं गया की वो परिवार हु  हम चाहते हैं वही गर्माहट जो पहले दादी-नानी की कहानियों में मिलती थी वो हमको मिले पर जब वो मेहमान बन गए तो और  वो कहानियाँ और आँगन गायब हो गए, तो हमने virtual दुनिया को अपना सहारा बना लिया।अब मेरे बच्चों के लिए भी उसके दादा दादी नाना नानी मेहमान ही होंगे क्युकी हमको जो बताया गया जो समझाया गया हमने वही तो माना तो अब यह कह देना की हमको रिश्ते की समझ नहीं कहा तक सही है

 

 पढ़ाई और करियर का दबाव : आलसी नहीं, थके हुए

सौरभ 12वीं क्लास में पढ़ता है।उसके पापा रोज़ कहते—"अगर अच्छे नंबर नहीं आए तो कुछ नहीं कर पाओगे।"

सौरभ ने दिन-रात किताबें पढ़ीं।कभी library में, कभी coaching में, कभी online tuitions में।परंतु दबाव इतना बढ़ गया कि उसने दोस्तों से मिलना भी छोड़ दिया।परीक्षा के बाद भी उसे खुशी नहीं हुई, क्योंकि उसे डर था कि पापा अब और भी ज़्यादा उम्मीद करेंगे।

यह सिर्फ़ सौरभ की कहानी नहीं, हम Gen Z के हर बच्चे की कहानी है।हम पर सबसे बड़ा बोझ यही है—performance का।हमसे कहा जाता है कि हम "आलसी " हैं।पर सच तो यह है कि हम बचपन से ही इतने competition में धकेले गए हैं कि थक गए हैं। हम मेहनत से नहीं डरते।पर हमें चाहिए कि हमें सिर्फ़ marks पर न आँका जाए।हमारी creativity, communication skills और passion भी हमारे भविष्य का हिस्सा हैं।हम चाहते हैं कि हमारी मेहनत को उसकी quality से आँका जाए, न कि सिर्फ़ एक number से।

 

 

 सोशल मीडिया और पहचान : validation की तलाश

नेहा मेरी दोस्त है।उसकी दुनिया Insta पर है।वो हर दिन अपनी एक न एक photo डालती है।अगर 200 likes आते हैं तो पूरा दिन मुस्कुराती है।अगर likes कम हो जाते हैं तो उसका mood खराब हो जाता है।

लोग कहते हैं—"Gen Z तो बस likes और followers के पीछे भागती है।"

पर सच तो यह है कि नेहा validation चाहती है।वो कहती है—"असल में मैं सिर्फ़ चाहती हूँ कि कोई notice करे कि मैं exist करती हूँ।अगर घर में रोज़ कोई कह दे कि ‘हम तुम पर गर्व करते हैं,’ तो शायद मुझे likes की ज़रूरत ही न पड़े।"Gen Z को appreciation चाहिए, recognition चाहिए।अगर वो घर और समाज से नहीं मिलता, तो हम उसे online खोजते हैं।हमारे लिए likes और followers सिर्फ़ numbers नहीं, बल्कि attention और acceptance का प्रतीक हैं।

 

 हमारी rebellion : सवाल पूछना अपराध क्यों?

हमारे बड़ों को लगता है कि हम rebellious हैं।क्योंकि हम परंपराओं को बिना सोचे-समझे follow नहीं करते।क्योंकि हम पूछते हैं—

  • क्यों लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग नियम हों?

  • क्यों mental health पर बात करना taboo है?

  • क्यों climate change को नजरअंदाज किया जाए?

हम rebel नहीं, हम responsible हैं।हम वो सवाल पूछते हैं जिन्हें पिछली generations ने दबा दिया।हम चाहते हैं कि समाज evolve करे, rigid न रहे।अगर हम बदलाव की बात करते हैं तो वो arrogance नहीं है, बल्कि awareness है।हम Gen Z blind followers नहीं, बल्कि critical thinkers हैं।

 

 

Fake news और अंधविश्वास का जाल

विवेक, जो मेरे साथ पढ़ता था, धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर एक तथाकथित "चमत्कारिक बाबा" के videos देखने लगा।वो कहता था—"अगर ये मंत्र पढ़ लो तो बीमारियाँ गायब हो जाएँगी।""पढ़ाई किए बिना भी अच्छे नंबर लाने का गुप्त तरीका है।"

शुरुआत में हमें हँसी आती थी, पर धीरे-धीरे विवेक ने पढ़ाई से दूरी बना ली।वो online चमत्कारों में खो गया और असल ज़िंदगी में पिछड़ता चला गया।बाद में जब उसे असलियत समझ आई, तब तक उसका आत्मविश्वास टूट चुका था।ये कहानी सिर्फ़ विवेक की नहीं है।हम Gen Z पर information की बाढ़ है—कभी सच्ची, कभी झूठी।इतना content है कि सही और गलत में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।अगर हमें कोई guide न करे, तो हम जल्दी ही फर्जी ट्रेंड्स और अफवाहों में फँस सकते हैं।

इसका मतलब ये नहीं कि हम नासमझ हैं।बल्कि ये कि हमें सही दिशा और critical thinking की ट्रेनिंग चाहिए।

 

 Pandemic का असर : हमारी generation की सबसे बड़ी परीक्षा

जब COVID-19 आया, हम Gen Z उस समय teenagers थे।Online classes, घर में isolation, uncertainty—सबने हमें बदल दिया।हमने दोस्तों को खोया, relatives को खोया और शायद normal childhood भी।

मेरा एक दोस्त आकाश रोज़ कहता था—"ऑनलाइन पढ़ाई तो हो रही है, पर यार… दोस्त कहाँ हैं?क्लास का मज़ा कहाँ है?खेलना, हँसना, कैंटीन जाना—सब छिन गया।"

Pandemic ने हमें practical और flexible तो बना दिया, पर anxiety और loneliness भी दे गया।हमने सीखा कि दुनिया कभी भी बदल सकती है।लेकिन जब हमने openly कहा कि हमें मदद चाहिए, तो कई बार यही सुनने को मिला—"ये सब drama है।"

हम कमजोर नहीं हैं।हम सिर्फ़ इतने honest हैं कि अपनी mental health पर चुप नहीं रहते।यही हमें अलग बनाता है।

 

हमारी चाहत : आखिर हम सच में क्या चाहते हैं?

हमारी चाहत बहुत simple है।हम gadgets या luxury नहीं चाहते।हमारी असली चाहत है—

  • हमें gadgets नहीं, आपका समय (time) चाहिए।

  • हमें पैसे नहीं, आपका ध्यान (attention) चाहिए।

  • हमें lecture नहीं, आपकी listening चाहिए।

  • हमें सिर्फ़ marks पर नहीं, हमारी skills और dreams पर भरोसा चाहिए।

हम आपसे बस इतना चाहते हैं कि हमें समझा जाए, सुना जाए और हम पर भरोसा किया जाए।

 

समाधान : रास्ता कहाँ है?

हम Gen Z खोए हुए नहीं हैं।हाँ, हम चुनौतियों से घिरे हैं, लेकिन हर challenge के साथ solution भी है।अगर परिवार, शिक्षा और समाज हमें सही दिशा दे तो हम वही generation साबित होंगे जो भविष्य को रोशन करेगी।

 परिवार की भूमिका

·       माता-पिता सिर्फ़ पैसे या gadgets तक सीमित न रहें, बल्कि हमें समय और भावनात्मक सहारा दें।

·       हर घर में "डिजिटल-फ्री टाइम" होना चाहिए, जहाँ सब लोग बिना फोन के बैठें और बातें करें।

·       अगर आप हमें सुनेंगे, तो हमें लगेगा कि हमारी बातें मायने रखती हैं।

शिक्षा प्रणाली में बदलाव

·       स्कूल और कॉलेज में life skills और mental health की शिक्षा भी ज़रूरी है।

·       हमें सिर्फ़ marks की दौड़ में मत धकेलें, बल्कि हमारी creativity, communication और leadership को भी पहचानें।

·       पढ़ाई हमें stress नहीं, inspiration देनी चाहिए।

 डिजिटल संतुलन

·       हमें ये सिखाना ज़रूरी है कि online दुनिया अच्छी है, पर वही सबकुछ नहीं।

·       अगर parents और teachers खुद भी digital balance अपनाएँगे, तो हमें सीखना आसान होगा।

·       "Digital Detox Day" जैसे छोटे campaigns से बड़ा बदलाव आ सकता है।

 मेंटॉरशिप और मूल्य शिक्षा

·       दादा-दादी, शिक्षक और समाज के बड़े हमें अपने जीवन के अनुभव सुनाएँ।

·       कहानियों और परंपराओं से हमें जोड़ें ताकि हम अपनी जड़ों को न भूलें।

·       हमें आदर्शों की ज़रूरत है—role models जो हमें inspire करें।

🧠 मानसिक स्वास्थ्य का सहारा

·       Counseling और therapy को stigma मत बनाएँ।

·       कॉलेज और workplaces में counselors उपलब्ध हों।

·       हमें ये महसूस होना चाहिए कि help माँगना कमजोरी नहीं, ताक़त है।

 

लोग हमें अक्सर कहते हैं—"Gen Z तो डिजिटल में खो गई है।"

पर सच्चाई यह है कि हम खोए हुए नहीं, evolving हैं।हम तेज़ हैं, हम सवाल पूछते हैं, हम बदलाव चाहते हैं।हम equality की बात करते हैं, mental health पर खुलकर बोलते हैं और climate change जैसी global problems को गंभीरता से लेते हैं।

हम rebellious नहीं, responsible हैं।हम कमजोर नहीं, honest हैं।हम खोए हुए नहीं, उम्मीद हैं।

अगर हमें सही दिशा, भावनात्मक सहारा और real-world experiences दिए जाएँ,तो हम वही generation साबित होंगे जो डिजिटल और वास्तविक दुनिया के बीच पुल बनाएगी।

हम Gen Z सिर्फ़ mobile और social media तक सीमित नहीं हैं।हम dreamers भी हैं, creators भी, और leaders भी।हमें सिर्फ़ आपका साथ, भरोसा और समझ चाहिए।

"हम खोई हुई पीढ़ी नहीं, हम भविष्य की सबसे बड़ी ताक़त हैं।हम वही Gen Z हैं, जो आने वाले कल को नए रंग और नई उम्मीद देगी।"

 

शालू दुग्गल

 
 
 

Comments


bottom of page