क्या दोष है Gen-Z का... या हमारा माहौल?
- Duggal Shallu
- Aug 5
- 4 min read
क्या दोष है Gen-Z का... या हमारा माहौल?
दोष देने से पहले, हमें अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी।
"आजकल के बच्चे बिगड़ गए हैं।"
शायद यह वाक्य आपने भी कई बार सुना होगा। कभी किसी रिश्तेदार से, कभी पड़ोसी से, कभी किसी शिक्षक से, तो कभी किसी माता-पिता से।
लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह सोचा कि जिसे हम "बिगड़ना" कह रहे हैं, वह वास्तव में एक पीढ़ी की पुकार तो नहीं?
सोलह वर्षीय आरव रोज़ की तरह स्कूल से घर लौटा। उसने बैग सोफे पर रखा और सीधे अपने कमरे में चला गया। माँ ने आवाज़ लगाई—
"पहले खाना खा लो।"
अंदर से केवल एक जवाब आया—"बाद में।"

कुछ देर बाद पिता ऑफिस से लौटे। उन्होंने देखा कि आरव मोबाइल पर था।
"बस यही काम रह गया है? पढ़ाई छोड़कर पूरा दिन फोन!"
आरव ने कुछ नहीं कहा। उसने मोबाइल रखा, अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और देर रात तक बाहर नहीं निकला।
घरवालों ने फैसला कर लिया—"बच्चा बिगड़ गया है।"
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि आज स्कूल में उसके सबसे अच्छे दोस्त ने उससे बात करना क्यों बंद कर दिया। किसी ने यह नहीं जाना कि पिछले तीन महीनों से वह लगातार सोशल मीडिया पर अपनी तुलना दूसरों से कर रहा था। किसी ने यह नहीं समझा कि वह हर दिन यह सोचकर डरता था कि अगर उसके नंबर कम आए, तो वह अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाएगा।
उसे केवल डाँट मिली... समझ नहीं।
यहीं से सवाल शुरू होता है—
क्या दोष सचमुच Gen-Z का है, या उस माहौल का जिसमें वे बड़े हो रहे हैं?
हर पीढ़ी अपने समय की उपज होती है
आज के माता-पिता अक्सर कहते हैं—
"हमारे समय में ऐसा नहीं होता था।"
बिल्कुल सही।
लेकिन हमारे समय में न 24 घंटे सोशल मीडिया था, न हर पल तुलना करने वाला डिजिटल संसार। न हर उपलब्धि लाइक्स और फॉलोअर्स से मापी जाती थी।
आज का बच्चा स्कूल से लौटता है, लेकिन प्रतियोगिता वहीं खत्म नहीं होती। मोबाइल खोलते ही उसे किसी की सफलता, किसी की खूबसूरती, किसी की विदेश यात्रा और किसी की महंगी ज़िंदगी दिखाई देती है।
वह धीरे-धीरे यह मानने लगता है कि उसकी अपनी ज़िंदगी कम है।
माहौल बच्चों को बनाता है
एक पौधा कभी खुद तय नहीं करता कि उसे धूप मिलेगी या छाँव।
उसे जो वातावरण मिलता है, वह उसी के अनुसार बढ़ता है।
बच्चे भी ऐसे ही होते हैं।
अगर घर में संवाद की जगह झगड़े हों...
अगर प्यार की जगह तुलना हो...
अगर सुनने की जगह केवल आदेश हों...
तो बच्चा भावनात्मक रूप से सुरक्षित कैसे महसूस करेगा?
आज हम कहते हैं कि बच्चे गुस्सैल हो गए हैं।
लेकिन क्या हमने यह देखा कि वे रोज़ कितना तनाव झेल रहे हैं?
मोबाइल समस्या है... या उसका विकल्प न होना?
अक्सर कहा जाता है कि Gen-Z मोबाइल में खो गई है।
यह बात पूरी तरह गलत भी नहीं है।
लेकिन सवाल यह है—
क्या हमने उन्हें मोबाइल के अलावा कोई ऐसी दुनिया दी, जहाँ वे जाना चाहें?
कितने परिवार रोज़ आधा घंटा बिना फोन के साथ बैठते हैं?
कितने माता-पिता अपने बच्चों से केवल यह पूछते हैं—
"आज तुम्हारा दिन कैसा था?"
मोबाइल ने जगह बनाई, क्योंकि संवाद की जगह खाली होती चली गई।
भावनाएँ छिपाने वाली नहीं, समझने वाली चीज़ हैं
पहले बच्चों से कहा जाता था—
"लड़के रोते नहीं।"
"इतनी छोटी-सी बात पर परेशान मत हो।"
"हमारे सामने ज़ुबान मत चलाओ।"
आज की पीढ़ी इन बातों को स्वीकार नहीं कर रही।
वे कहते हैं—
"मैं ठीक नहीं हूँ।"
"मुझे मदद चाहिए।"
"मैं मानसिक रूप से थक गया हूँ।"
क्या यह कमजोरी है?
या फिर यह भावनात्मक ईमानदारी है?
Gen-Z की सबसे बड़ी चुनौती—अकेलापन
हज़ारों ऑनलाइन दोस्त होने के बावजूद, आज का युवा पहले से ज़्यादा अकेला है।
वह स्टेटस अपडेट करता है, लेकिन मन की बात नहीं।
वह मुस्कुराती तस्वीर डालता है, लेकिन रात को रोता है।
क्यों?
क्योंकि उसे डर है कि लोग उसे जज करेंगे।
दोष देना आसान है, जिम्मेदारी लेना मुश्किल
जब बच्चा चिड़चिड़ा होता है, हम कहते हैं—
"इसका व्यवहार खराब है।"
लेकिन शायद हमें पूछना चाहिए—
क्या वह पर्याप्त नींद ले रहा है?
क्या उसे बिना शर्त स्वीकार किया जाता है?
क्या उसके पास अपनी बात कहने की जगह है?
क्या वह केवल अंक और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व से भी स्वीकार किया जाता है?
हमें क्या बदलना होगा?
अगर हम सचमुच अगली पीढ़ी को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो बदलाव बच्चों से पहले हमें करना होगा।
हमें—
बच्चों को सुनना सीखना होगा।
तुलना बंद करनी होगी।
घर को सुरक्षित भावनात्मक स्थान बनाना होगा।
स्क्रीन टाइम के साथ-साथ "फैमिली टाइम" भी बढ़ाना होगा।
सफलता से ज़्यादा मानसिक स्वास्थ्य को महत्व देना होगा।
अंत में...
Gen-Z पर उंगली उठाने से पहले हमें अपने हाथों को देखना होगा।
क्योंकि वही हाथ उनके बचपन को आकार देते हैं।
वही हाथ उन्हें सहारा भी दे सकते हैं और धक्का भी।
याद रखिए...
बच्चे कभी केवल अपने समय से नहीं बनते, वे अपने परिवार, अपने समाज और अपने माहौल से बनते हैं।
अगर हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी संवेदनशील, आत्मविश्वासी और मानसिक रूप से स्वस्थ बने, तो हमें उन्हें केवल सलाह नहीं, बल्कि समय देना होगा; केवल अनुशासन नहीं, बल्कि संवाद देना होगा; केवल अपेक्षाएँ नहीं, बल्कि स्वीकार्यता देनी होगी।
इसलिए अगली बार जब आपके मन में यह विचार आए कि—
"आज की Gen-Z बिगड़ गई है..."
तो एक पल ठहरकर स्वयं से पूछिए—
"क्या हमने उन्हें वह माहौल दिया, जिसमें वे बिना डर के सीख सकें, गलती कर सकें, अपनी बात कह सकें और अपने मन की उलझनें साझा कर सकें?"
क्योंकि अक्सर समस्या Gen-Z नहीं होती... समस्या वह माहौल होता है, जिसे हमने उनके लिए तैयार किया है।
और जब माहौल बदलता है, तो पीढ़ियाँ भी बदल जाती हैं।
Shallu Duggal
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