पेरेंटिंग और मानसिक स्वास्थ्य
- Duggal Shallu
- Apr 6
- 3 min read
Updated: Apr 20

पेरेंटिंग और मानसिक स्वास्थ्य: बच्चों के भविष्य की असली नींव
आज के समय में पेरेंटिंग सिर्फ बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने या उनकी ज़रूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं रह गई है। असल चुनौती है—बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को समझना और उसे सही दिशा देना। क्योंकि एक बच्चे का मन ही उसके पूरे व्यक्तित्व की नींव होता है।
हम अक्सर बच्चों के अंक, उनकी उपलब्धियों और व्यवहार पर ध्यान देते हैं, लेकिन उनके अंदर चल रही भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यही अनदेखी आगे चलकर बच्चों में डर, गुस्सा, अकेलापन और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का कारण बनती है।
मानसिक स्वास्थ्य क्यों है ज़रूरी?
मानसिक स्वास्थ्य का मतलब केवल यह नहीं है कि बच्चा बीमार नहीं है, बल्कि यह उसकी भावनात्मक, सामाजिक और मानसिक संतुलन की स्थिति है। एक मानसिक रूप से स्वस्थ बच्चा:
अपनी भावनाओं को समझता और व्यक्त करता है
दूसरों के साथ स्वस्थ संबंध बना पाता है
चुनौतियों का सामना करने की क्षमता रखता है
जब बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य मजबूत होता है, तो वे न केवल पढ़ाई में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
पेरेंटिंग में सबसे बड़ी गलती
आज के दौर में कई माता-पिता अनजाने में एक बड़ी गलती कर रहे हैं—वे बच्चों को “परफेक्ट” बनाने की कोशिश में उनके “नेचुरल इमोशंस” को दबा देते हैं।
उदाहरण के लिए:
“रोते क्यों हो? तुम तो स्ट्रॉन्ग हो”
“डरने की क्या बात है?”
“इतनी छोटी सी बात पर गुस्सा?”
ऐसे वाक्य बच्चों को यह सिखाते हैं कि उनकी भावनाएं गलत हैं। धीरे-धीरे बच्चा अपनी फीलिंग्स को दबाना सीख जाता है, जो आगे चलकर एंग्जायटी और डिप्रेशन का कारण बन सकता है।
भावनात्मक जुड़ाव की अहमियत
पेरेंटिंग में सबसे महत्वपूर्ण चीज है—इमोशनल कनेक्शन।
जब बच्चा यह महसूस करता है कि:👉 “मेरे माता-पिता मुझे समझते हैं”👉 “मैं जो महसूस करता हूँ, वह महत्वपूर्ण है”
तब वह खुद को सुरक्षित महसूस करता है।
इमोशनल कनेक्शन बनाने के लिए:
रोज 10-15 मिनट बिना किसी डिस्टर्बेंस के बच्चे से बात करें
उसकी बातों को बिना जज किए सुनें
उसकी छोटी-छोटी बातों में भी दिलचस्पी दिखाएं
डिजिटल युग और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य
आज के बच्चे मोबाइल और स्क्रीन के बीच बड़े हो रहे हैं। जहां एक तरफ टेक्नोलॉजी सीखने में मदद करती है, वहीं दूसरी तरफ यह बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर भी बना सकती है।
अधिक स्क्रीन टाइम के कारण:
बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ता है
नींद की समस्या होती है
सोशल स्किल्स कम हो जाती हैं
इसलिए जरूरी है कि माता-पिता:
स्क्रीन टाइम को लिमिट करें
बच्चों को आउटडोर एक्टिविटीज में शामिल करें
खुद भी मोबाइल का संतुलित उपयोग करें
डिसिप्लिन vs डर
अक्सर पेरेंट्स बच्चों को सुधारने के लिए डांट या सजा का सहारा लेते हैं। लेकिन यह तरीका बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।
डिसिप्लिन का मतलब डर पैदा करना नहीं है, बल्कि सही दिशा दिखाना है।
उदाहरण:❌ “अगर तुमने यह नहीं किया तो मैं तुमसे बात नहीं करूंगा”✔ “अगर तुम यह काम समय पर करोगे, तो तुम्हें खेलने का ज्यादा समय मिलेगा”
पॉजिटिव डिसिप्लिन बच्चों में जिम्मेदारी और आत्मविश्वास दोनों बढ़ाता है।
माता-पिता का व्यवहार ही बच्चों की सीख है
बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं।
अगर घर में:
बार-बार झगड़े होते हैं
गुस्सा और तनाव ज्यादा होता है
एक-दूसरे की इज्जत नहीं होती
तो बच्चा भी यही व्यवहार सीखता है।
इसके विपरीत, अगर माता-पिता:
शांत और समझदारी से बात करते हैं
एक-दूसरे का सम्मान करते हैं
समस्याओं को मिलकर हल करते हैं
तो बच्चा भी भावनात्मक रूप से मजबूत बनता है।
बच्चों को “सुनना” सीखें, सिर्फ “समझाना” नहीं
अक्सर पेरेंट्स बच्चों को हर बात समझाने में लगे रहते हैं, लेकिन उनकी बात सुनना भूल जाते हैं।
याद रखें:👉 हर बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत है—किसी के उसे ध्यान से सुनने की
जब बच्चा अपनी बात खुलकर कह पाता है, तो उसका मन हल्का होता है और वह खुद समाधान ढूंढने की क्षमता विकसित करता है।
निष्कर्ष
पेरेंटिंग कोई परफेक्ट होने की यात्रा नहीं है, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है।
एक अच्छा माता-पिता वही है जो:
अपने बच्चे की भावनाओं को समझे
उसे बिना शर्त स्वीकार करे
और उसे सुरक्षित वातावरण दे
क्योंकि अंत में, बच्चों को महंगे खिलौने या बड़ी सुविधाएं नहीं याद रहतीं—उन्हें याद रहता है कि उनके माता-पिता ने उन्हें कितना समझा, सुना और प्यार दिया।
लेखिका:शालू दुग्गल(काउंसलिंग प्रैक्टिशनर एवं ह्यूमन बिहेवियर एक्सपर्ट)
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